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Chausatthi Devi tradition of offering first gulal since 501 years in Varanasi

मां चौसठ्ठी देवी
– फोटो : अमर उजाला

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परंपराओं से भी प्राचीन आदियोगी शिव की नगरी काशी में अनादि काल से परंपराएं प्रवाहमान हैं। बनारस में 501 साल से भी अधिक प्राचीन रंगोत्सव की परंपरा होली पर निभाई जाएगी। दिन भर रंग खेलने के बाद काशीवासी मुट्ठी भर अबीर-गुलाल मां चौसठ्ठी देवी के चरणों में अर्पित करते हैं और तंत्र की देवी से मुक्ति की कामना करते हैं।

बनारसी फगुआ के तार काशीपुराधिपति से जुड़े हुए हैं। बाबा विश्वनाथ के गौने पर काशीवासी बाबा और मां गौरा को गुलाल अर्पित करके होली के हुड़दंग की अनुमति लेते हैं। पांच शताब्दियों से अधिक समय से काशीवासी रंग-फाग के बाद मां चौसठ्ठी देवी को गुलाल अर्पित करके धूलिवंदन के साथ ही दरबार को जगाते हैं। दशाश्वमेध घाट के पास स्थित माता का मंदिर होली की शाम को गुलाल-अबीर के रंग में रंग जाता है।

श्री काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने बताया कि चौसट्ठी देवी के चरणों में गुलाल चढ़ाए बगैर काशी में रंगोत्सव की पूर्णता ही नहीं मानी जाती है। पुराने समय में शहर ही नहीं गांव से भी लोग चौसठ्ठी देवी को गुलाल अर्पित करने आते थे। चौसठ्ठी देवी की यात्रा गाजे-बाजे के साथ निकलती थी। बदलते समय के साथ परंपरा तो नहीं बदली, लेकिन चौसठ्ठी यात्रा अब सीमित हो चुकी है।

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