World Pulses Day today: Acharya Charak advised patients to eat pulses and khichdi

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भारतीय भोजन की शान और पौष्टिकता और विटामिन से भरपूर दालों का इतिहास काफी प्राचीन है। आयुर्वेद के जनक आचार्य चरक ने मरीजों को दाल और खिचड़ी खाने की सलाह दी थी, बौद्ध या जैन ग्रंथों में दाल का उल्लेख मिल जाता है। ऐसा माना जाता है कि सर्वप्रथम मूंग की दाल भोजन में सम्मिलित हुई थी। धीरे-धीरे अन्य दालें भारतीयों के भोजन की शान बनती गईं। दालों में विटामिन और प्रोटीन होता है। एक अनुमान के अनुसार दालों में तीन से चार प्रतिशत तक प्रोटीन और विटामिन मिलता है। भारत जैसे देश में दालों से प्राप्त पौष्टिकता एक सामान्य व्यक्ति के लिए जीवन जीने का आधार है।

बॉलीवुड भी दालों का दीवाना

भारतीय दालों का दीवाना हिंदी सिनेमा और गीतकार भी रहे हैं। 1973 की फिल्म ज्वार भाटा, का गीत हर व्यक्ति की जुबान पर था -‘ये समझो और समझाओ ,थोड़ी में मौज मनाओ, दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ’, इस गीत से अनुमान लगाया जा सकता है कि 70 के दशक में दालों के भाव दो तीन रुपये किलो ही होंगे, तभी गीतकार ने दाल-रोटी खाने का उल्लेख किया है। दालों में भी मूंग, तुवर, मसूर, चना, उड़द और राजमा दाल अलग-अलग प्रदेश में स्वाद अनुसार खाई जाती है।

मप्र में मूंग, चना, उड़द व अरहर का ज्यादा उपयोग

मध्य प्रदेश में मूंग, चना, उड़द और अरहर (तुवर) दाल मुख्यतः उपजाई जाती है और खाई भी जाती है। तुवर दाल को दालों का राजा भी कहा जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के खाद्य और कृषि संगठन ने दालों में महत्व को समझते हुए 2013 में एक प्रस्ताव पारित किया था। 2016 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने अंतरराष्ट्रीय दलहन वर्ष घोषित किया था और 2019 से प्रतिवर्ष 10 फरवरी को दलहन दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी।

मप्र कृषि उत्पादन में अव्वल

मध्य प्रदेश कृषि उत्पादन के क्षेत्र में देश में कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। सात बार प्रदेश को कृषि कर्मण अवॉर्ड से सम्मनित किया जा चुका है। प्रदेश को सोया स्टेट भी कहा जाता है। गेहूं और दलहनों के उत्पादन के लिए प्रदेश को कृषि कर्मण पुरस्कार प्राप्त हो चुका है।

मप्र के 21 फीसदी कृषि क्षेत्र में दलहन उत्पादन

विश्व में दालों के उत्पादन में भारत एक अग्रणी देश है। भारत में 65 प्रतिशत खेती में करीब 27 प्रतिशत भाग में दाल होती है। देश में प्रमुख दालों के उत्पादक राज्य मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश हैं। किसान कल्याण और कृषि मंत्रालय मध्य प्रदेश शासन की रिपोर्ट 2021-22 के अनुसार मप्र के कुल कृषि उपजाऊ क्षेत्र के 21 प्रतिशत क्षेत्र में दलहनें उपजाई जाती हैं। लगभग 59.70 लाख टन दलहन का प्रदेश में उत्पादन हुआ था। मध्य प्रदेश देश का प्रमुख दाल उत्पादक राज्य है।

महंगी होने से गरीबों की थाली से दूर हो रही तुअर दाल

दाल मुख्यत खरीफ में तुवर, मूंग और उड़द, रबी में चना, मसूर और मटर ग्रीष्म में मूंग और उड़द की फसल बोई जाती है। अन्य नगद फसलों के कारण वर्तमान में किसान तुवर या अरहर को बोने में कम रुचि रखते हैं, तुवर को जुलाई माह में बुवाई करने पर यह फसल फरवरी-मार्च माह तक आती है। इस तरह यह फसल करीब आठ-नौ माह में होती है, इसलिए किसान इसके बजाय जल्दी उपजने वाली फसलों में रुचि रखते हैं। तुवर की दाल के आसमान छूते भाव से यह गरीबों की थाली से अब दूर हो गई है।

लंबा वक्त लेती है अरहर की फसल

हरदा जिले के कड़ोला ग्राम के रंजीत सिंह एक युवा किसान हैं, उनके अनुसार मेरी चालीस एकड़ खेती की जमीन पर करीब दो एकड़ में तुअर बोई थी, करीब 20 किलो तुवर बोने पर 15 क्विंटल फसल पैदा हुई है। कम मात्रा में अरहर बोने की मुख्य वजह यह है कि तुअर की फसल पैदा होने में लंबा समय लेती है। इसके विपरीत मालवा में उज्जैन के समीप तराना के कृषक बद्रीलाल पांचाल अरहर नहीं बोते हैं। उनका कहना है की नगद फसलों में रुचि है और नील गाय इन फसलों की और ज्यादा आकर्षित होती है और इनका नुकसान कर देती है। कृषि वैज्ञानिकों, अनुसंधान कर्ताओं को चाहिए कि दालों की कम समय में उपजने वाली फसलों को ईजाद करें और किसानों को इसकी पैदावार करने के लिए प्रोत्साहित करे, ताकि वे इन फसलों की और ध्यान दें। जब दालों की कीमतें आमजन की खरीद में होंगी तब वह बड़े आराम से 1973 का गीत गुनगुना सकेंगे कि दाल रोटी खाओ और प्रभु के गुण गाओ।



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