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आंखों के विशेषज्ञ
– फोटो : न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर

विस्तार


अल्पदृष्टि, विजन थैरेपी और बच्चों में बढ़ रहे दृष्टि दोषों के संबंध में मार्गदर्शन और जागरूकता बढ़ाने के लिए इंदौर डिविजनल ऑप्टोमेट्री ब्लाइंड वेलफेयर एसोसिएशन एवं ऑप्टोमेट्री काउंसिल ऑफ इंडिया के संयुक्त संयोजन से रविवार को तीसरी नेशनल ऑप्टोमेट्री कांफ्रेंस “दृष्टि मंथन 24” का आयोजन किया गया। इंदौर के ब्रिलियंट कन्वेंशन में हुई इस एकदिवसीय कांफ्रेंस में देशभर के 200 से अधिक दृष्टि दोष विशेषज्ञ (ऑप्टोमेट्रिस्ट) शामिल हुए।

अहमदाबाद के वरिष्ठ लेक्चरर ऑप्टोमेट्रिस्ट अतानु सामंता ने कहा, छोटी उम्र और किशोरावस्था में ही आंखों का कमजोर हो जाना आज एक बड़ी समस्या है। एक वक्त पर जब आंखों की रोशनी सिर्फ बुजुर्गों में कम होती थी लेकिन अब छोटे-छोटे बच्चे भी चश्मा लगाए हुए दिख जाते हैं। आज के वक्त में ज्यादा स्क्रीन टाइम बिताना बच्चों में कमजोर दृष्टि का मुख्य कारण बन रहा है। उम्र 5 साल हो या 22 साल। हर कोई अपने दिन का आधा से ज्यादा वक्त स्क्रीन टाइम पर बिता रहा है। फिर चाहे वो टीवी हो मोबाइल हो या लैपटॉप। आंखों के लिए विटामिन और मिनरल्स  बहुत जरूरी हैं। डाइट में इनकी कमी आंखों की समस्याएं उत्पन्न कर सकती हैं। बच्चों को सूर्य की रोशनी में खेलने दें, उनका मोबाइल देखना बिल्कुल बंद करें। विजन थैरेपी की जरूरत तब होती है जब मष्तिष्क में एक इमेज नहीं बन पाती एवं ड्यूल इमेज की समस्या होने लगती है। यह आंखों की मसल्स के लिए बेहद कारगर होती है।

छः महीने में रेटिना जांच करवाएं

बैंगलोर से आई ऑप्टोमेट्री काउंसिल ऑफ इंडिया की सीओओ ऑप्टोमेट्रिस्ट पॉला मुखर्जी ने बताया, मधुमेह का भी आंखों पर गंभीर एवं नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। मरीजों को प्रत्येक छः माह में रेटिना की जांच अवश्य करवानी चाहिए। इस जांच में ऑप्टोमेट्रिस्ट की भूमिका मत्वपूर्ण होती है। बदलती लाइफ स्टाइल से टाइप टू डायबिटिज के ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं। बच्चे सूर्य प्रकाश में जितना अधिक खेलते हैं वह उतनी अधिक दूर देखते हैं। इससे आंखों का विकास तेजी से होता है। विकास की उम्र में हम उन्हें मोबाइल पकड़ा देते हैं और उनकी आंखों की ग्रोथ को कम कर देते हैं। 

लक्षणों को पहचानें

चेन्नई से आए देश के नामचीन ऑप्टोमेट्रिस्ट डॉ. संजय मेहता ने चश्मे की उपयोगिता को बताते हुए कहा, जब दूर की चीजें कम या धुंधली नजर आती हैं तो इस स्थिति को मायोपिया कहते हैं। आईबॉल की लंबाई ज्यादा होने के कारण यह समस्या होती है। माओपिया के लक्षणों में दूर की चीजें ठीक से नजर न आना, बच्चों का टीवी बहुत करीब जाकर देखना, सिर में बार बार दर्द, आंखों को सिकोड़कर देखना शामिल है। हाई मायोपिया के कारण देखने की क्षमता लगातार कम होने का खतरा होता है। इसके लिए माइनस पावर का चश्मा या कॉन्टेक्ट लेंस पहनने की सलाह दी जाती है।

भोजन सबसे महत्वपूर्ण

भारती विद्यापीठ सांगली महाराष्ट्र में ऑप्टोमेट्री संकाय के विभागाध्यक्ष ऑप्टोमेट्रिस्ट अजित लिमये ने आंखों से जुड़े रोग ड्राई आई की जानकारी देते हुए कहा, आंख की कई ऐसी बीमारियां हैं जो कि जन्म से होती हैं या जन्म के कुछ वक्त बाद होती हैं, इसी में से एक बीमारी ‘लो विजन’ या ‘अल्प दृष्टि’ है। कुछ लोगों को रात में न दिखाई देने की बीमारी होती है। इसे लो लाइट विजन कहा जाता है। ये बीमारी जन्मजात होती है। कुछ मानसिक विकार या आनुवांशिक विसंगतियां भी लो विजन की वजह होती हैं। लो विजन एक ऐसी समस्या है, जिसमें देखना मुश्किल हो जाता है। चश्मे, कान्टैक्ट लेंस या किसी अन्य सर्जिकल विधि की मदद से ठीक नहीं किया जा सकता है। लो विजन के मरीजों को परंपरागत चश्मे से दिखाई नहीं देता है। इसके लिए ओमेगा-3 फैटी एसिड्स, जिंक, विटामिन सी, ई से भरपूर चीजों के सेवन से काफी हद तक कमजोर नजर से बचा जा सकता है। आंखों की सेहत के लिए नियमित रूप से व्यायाम करना भी बहुत जरूरी माना जाता है। संतुलित आहार आंखों को लंबी उम्र तक स्वस्थ रखने के लिए बहुत जरूरी है।

पारखी को मिला लाइफ टाइम अचीवमेंट 

दृष्टि से जुड़े रोग, सावधानियां एवं उपचार को लेकर जागरूकता फैलाने बढ़ाने के उद्देश्य से की जा रही इस कांफ्रेंस में इंदौर डिविजनल ऑप्टोमेट्रिस्ट ब्लाइंड वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष ऑप्टोमेट्रिस्ट शैलेन्द्र वैष्णव, सचिव ऑप्टोमेट्रिस्ट धर्मेन्द्र आनिया एवं प्रवक्ता गजराज सिंह पवार समेत देश भर से आए ऑप्टोमेट्रिस्ट मौजूद थे। कांफ्रेंस में जन जागरण के उद्देश्य से एक स्मारक पत्रिका “दृष्टि मंथन” का विमोचन किया गया, जो नेत्र दोषों पर जागरूकता एवं इससे जुड़ी भ्रांतियों पर सटीक जानकारी प्रदान करेगी। इस अवसर पर वरिष्ठ ऑप्टोमेट्रिस्ट हेमंत रत्न पारखी को ऑप्टोमेट्री के क्षेत्र अभूतपूर्व कार्यों के लिए लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया।



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