republic day 2024 vinayak sitaram sarvate story

संविधान की वास्तविक प्रति की प्रतिकृति के ऊपर लगे स्व. सरवटे के चित्र को दिखातीं लिली डावर।
– फोटो : न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर

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कल गणतंत्र दिवस है और देश के संविधान की वास्तविक प्रति पर इंदौर के स्वर्गीय विनायक सीताराम सरवटे ने हस्ताक्षर किए हैं। उनके हस्ताक्षर और योगदान को अब इंदौर की सेंट्रल लाइब्रेरी ने संजोया है। सेंट्रल लाइब्रेरी की ग्रंथपाल लिली डावर ने बताया कि पहली बार संविधान में दिए उनके योगदान और देश के लिए किए गए उनके कार्यों को संजोया गया है। हमें इस बात की बेहद खुशी है कि हमें यह मौका मिला। आज लाइब्रेरी में आने वाले युवा उनके योगदान को जानकर प्रेरणा ले रहे हैं। मराठी भाषा रक्षण समिति और सरवटे परिवार के सहयोग से यह संभव हुआ है। वे संविधान सभा के सदस्य थे, जिसने राष्ट्र का संविधान बनाया था। संविधान की स्वीकृति के हस्ताक्षरों में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, पं. नेहरू, डॉ. अंबेडकर, सरदार पटेल के साथ उनके भी हस्ताक्षर हैं। सन् 1952 में उन्हें पहली राज्यसभा का सदस्य भी मनोनीत किया गया था। उनकी जनसेवा-राष्ट्रसेवा का इतिहास व स्मरण स्थायी रहे इसीलिए इंदौर के बस स्टैंड का नाम ‘सरवटे बस स्टैंड’ रखा गया है।

पद्मभूषण से सम्मानित हुए

विनायक सीताराम सरवटे को भारतवर्ष के राष्ट्रपति द्वारा देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया गया था। 1884 में उनका जन्म हुआ और 1972 में उन्होंने देह त्यागी। विनायक सरवटे एक स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ और साहित्यकार थे। उन्हें स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद तत्कालीन मध्य भारत प्रांत से भारत की संविधान सभा के लिए मनोनीत किया गया था। वे ‘तात्या साहेब सरवटे’ के नाम से सर्वत्र जाने जाते थे। 1966 में उन्हें साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में अमूल्य योगदान हेतु महामहिम राष्ट्रपति के हाथों ‘पद्मभूषण’ अलंकरण प्रदान किया गया था।

होलकर कालेज से राऊ तक रोज पैदल जाते थे

सरवटे का जन्म 2 अप्रैल 1884 को राजबाड़ा के समीप बक्षी गली में हुआ था। वे सामान्य कदकाठी के होकर तेज तर्रार – फुर्तीले थे। वे युवावस्था में रोजाना होलकर कॉलेज से राऊ तक पैदल जाना- आना करते थे। महाविद्यालयीन छात्र नेता रहे। दृढनिश्चयी-निडर और ओजस्वी वक्ता तात्या साहेब पढ़ाई पूरी करने के बाद शिक्षक और पुनर्वसन अधिकारी नियुक्त हुए। नौकरी करते हुए ही उन्होंने कानून की पढ़ाई भी प्रथम श्रेणी में की। वे अपने जमाने के प्रख्यात वकील थे। 1920 से 1939 तक उन्नीस साल उन्होंने वकालत की। 

संघ से जुड़े बाद में गांधी के साथ चले गए

वे 1920 के दशक में डॉ. हेडगेवार के संपर्क में आए। डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की तो तात्या साहब से इसकी एक शाखा इंदौर में खोलने का आग्रह किया। तब उन्होंने इंदौर में संघ की पहली शाखा शुरू की। वे कई वर्षों तक इंदौर के संघ चालक रहे। सन 1942 में गांधीजी के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भाग लेने के लिए उन्होंने आर.एस.एस. के संघचालक पद से त्यागपत्र दिया और आंदोलन में कूद पड़े। देश स्वतंत्र होने के पूर्व 1944 में उन्होंने मध्यभारत में ‘सेवादल’ की स्थापना की थी। उसके दो साल बाद 1946 में सेठ हीरालाल के सहयोग से अखबार का प्रकाशन शुरू किया। हिंदी दैनिक जयभारत में सुविख्यात पत्रकार स्वर्गीय राहुल बारपुते उनके सहयोगी रहे थे।

महिला और बाल शिक्षा पर काम किया

तात्या साहब ने बाल शिक्षा तथा महिला उत्थान के क्षेत्र में भी बहुत कार्य किया है। उन्होंने अपनी पुत्री शालिनी मोघे, जिन्हें बाद में ‘पद्मश्री’ से नवाजा गया, के साथ 1947 में ‘बाल निकेतन संघ’ विद्यालय की स्थापना की। जिसमें बच्चों को संस्कारित शिक्षा के साथ महिलाओं हेतु मॉन्टेसरी ट्रेनिंग, कामकाजी महिलाओं के बच्चों हेतु ‘झूलाघर’ एवं अनाथ बच्चों के लिए ‘वात्सल्य धाम’ के अभिनव विचार के साथ क्रियान्वयन किया गया। 

मराठी संस्था इंदुर के अध्यक्ष रहे

मराठी लोगों की देश प्रसिद्ध संस्था महाराष्ट्र साहित्य सभा, इंदुर के अध्यक्ष रहे। इसी संस्था के संग्रह में उनके द्वारा लिखे गए ‘मराठी साहित्य समालोचन’ के तीन खंड आज भी मौजूद हैं। महात्मा गांधी के साथ रहे इस महान विभूति का निधन 26 जनवरी 1972 को हुआ।



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