MP Election 2023: Congress is not able to find strong candidates in many constituencies

सांकेतिक तस्वीर
– फोटो : सोशल मीडिया

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इस बार के विधानसभा चुनाव में 2018 के नतीजों से बेहतर प्रदर्शन करने की तैयारी में लगी कांग्रेस मालवा-निमाड़ यानी इंदौर-उज्जैन संभाग के कई विधानसभा क्षेत्र में मजबूत उम्मीदवार ही ढूंढ नहीं पा रही है। इन क्षेत्रों में कांग्रेस पिछले कई चुनाव से लगातार हार रही है। यही कारण है कि चुनाव सामने हैं और इन क्षेत्रों में कांग्रेस फिर पुराने नतीजे को दोहराने की स्थिति में है।

यह वह क्षेत्र है जहां कांग्रेस कहीं चार, कहीं पांच, कहानी छह और कहीं तो सात चुनाव से लगातार हर रही है फिर भी आज तक कोई रोड मैप नहीं बन पाई है। आइए जानते हैं इन निर्वाचन क्षेत्रों के बारे में-

इंदौर दो : 1993 से हार रही है कांग्रेस

सुरेश सेठ और कृपाशंकर शुक्ला जैसे दिग्गजों के साथ ही डॉक्टर रेखा गांधी, अजय राठौर, छोटू शुक्ला और मोहन सिंगर जैसे नेता यहां पर भाजपा उम्मीदवारों से करारी शिकस्त खा चुके हैं। 2008 में रमेश मेंदोला के हाथों सुरेश सेठ की हार के बाद कांग्रेस ने यहां हाथ टेक से दिए हैं। पार्टी का कोई बड़ा नेता यहां से चुनाव लड़ना नहीं चाहता। इस बार यहां से पार्टी प्रत्याशी के रूप में नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष चिंटू चौकसे का नाम चल रहा है।

इंदौर चार : 1990 से जारी है हार का सिलसिला

इकबाल खान, उजागर सिंह, ललित जैन, गोविंद मंघानी, सुरेश मिंडा और सुरजीत सिंह चड्ढा यहां यहां शिकस्त खा चुके हैं। मंघानी को तो दो बार शिकस्त मिली है। इस बार यहां से राजा मांधवानी और अक्षय कांति बम के नाम उम्मीदवारी के लिए सामने आ रहे हैं।

देवास : सारे प्रयोग कर चुकी है कांग्रेस

यहां से लगातार छह चुनाव देवास राजघराने के युवराज पवार ने जीते। उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में गायत्री राजे पवार जीतीं और 2018 में भी जनता ने फिर उन्हें ही मौका दिया। कांग्रेस यहां कई प्रयोग कर चुकी है और हर बार असफल ही रही है। इस बार भी कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में प्रदीप चौधरी और प्रवेश अग्रवाल जैसे जो नाम सामने आ रहे हैं, वह भाजपा का मुकाबला करने में बहुत कमजोर माने जा रहे हैं। 80 के दशक में इंदौर के कांग्रेस नेता चंद्रप्रभाष शेखर ने यहां से दो चुनाव लड़े और दोनों में जीते। एक बार उन्होंने हिंदू सिंह परमार को हराया तो दूसरी बार बाबूलाल जैन को।

हरसूद : जिसे भी कांग्रेस मौका देती है वह शाह से हाथ मिला लेता है

यहां की दास्तां बहुत ही रोचक है। 1990 से विजय शाह यहां से लगातार चुनाव जीत रहे हैं। इतने सालों में भी कांग्रेस उन्हें टक्कर देने के लिए कोई नेता नहीं ढूंढ पाई। यहां मजेदार बात यह है कि कांग्रेस जिसे भी टिकट देती है वह मतदान की तारीख नजदीक आते-आते शाह से हाथ मिला लेता है।

उज्जैन उत्तर : 33 साल में केवल एक बार जीती है कांग्रेस

इस विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस 1990 से 2018 के बीच केवल एक बार जीत पाई है। 1998 में कांग्रेस के राजेंद्र भारती को यहां जीत मिली थी। भाजपा के पारस जैन को यहां से छह बार विधायक बनने का मौका मिला है। इस बार कांग्रेस से माया त्रिवेदी और विवेक यादव के नाम चर्चाओं में हैं। 

जावद : जमानत भी जब्त हो चुकी है कांग्रेस उम्मीदवार की

2003 से यहां कांग्रेस लगातार हार रही है और 2013 में तो कांग्रेस उम्मीदवार रघुराज सिंह चौरडिया की जमानत भी जब्त हो गई थी। पूर्व मुख्यमंत्री वीरेंद्र कुमार सकलेचा भी इस क्षेत्र से कई बार विधायक रहे। पिछले चार चुनाव में कांग्रेस ने यहां से घनश्याम पाटीदार, राजकुमार अहीर और रघुराज सिंह चौरडिया को उम्मीदवार बनाया, लेकिन वह भाजपा के सामने टिक नहीं पाए। अहीर यहां से दो बार चुनाव हारे। 

रतलाम : 1990 से 2018 तक हर चुनाव में हारी है कांग्रेस

रतलाम में भी कांग्रेस कई प्रयोग कर चुकी है, लेकिन 1990 से लेकर 2018 तक उसे हर बार हार ही मिली। 2008 में यहां से निर्दलीय चुनाव लड़े पारस सकलेचा को जरूर जीत मिली। यहां इस बार भी कांग्रेस के पास भाजपा को टक्कर देने के लिए कोई मजबूत दावेदार नहीं है। यह विधानसभा क्षेत्र कांग्रेस के दिग्गज नेता कांतिलाल भूरिया के लोकसभा क्षेत्र का ही एक हिस्सा रहा है।



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