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शिवराज के सामने कौन ?

भोपाल (देवानंद नायक) प्रदेश में बरसात अपनी रंगत विखेर रही है मौसम भी सर्द होने चला है पर देश प्रदेश की सियासत में सियासी पारा चढ़ता ही जा रहा है या यूं कहें कि सूबे में सियासी सरगर्मियां तेज होती जा रही है कुछ माह पूर्व यानी अप्रैल के माह में जब अमित शाह ने भाजपा के राजधानी में बृहद बैठक बुलाई थी तब प्रदेश की सियासत में शिवराज कमजोर व अलग थलग पढ़ते दिख रहे थे और अमित शाह के एक बयान जिसमें उन्होंने कहा था कि इस बार मध्यप्रदेश में चुनाव संगठन के नेतृत्व में लड़ा जायेग यह चुनाव कुशाभाऊ ठाकरे व राजमाता सिंधिया को समर्पित है इसके बाद शिवराज की बिदाई तय मानी जा रही थी किन्तु मुख्यमंत्री शिवराज भी सियासत के मंझे हुए खिलाड़ी हैं उन्होंने मत चूको चौहान बाली कहावत चरितार्थ करते हुए मास्टर स्ट्रोक खेल दिया और सामने लाये मुख्यमंत्री जनकल्याण योजना संबल इस संबल योजना ने गरीब और मजदूरों को सहारा तो दिया ही सबसे ज्यादा सियासी बल मिला शिवराज को , 14 विभागों की विभिन्न योजनाओं को सम्मिलित कर बनी संबल योजना की बिजली कर्ज माफी , फ्लैट रेट 200 रुपये में कनेक्शन , और गर्भवती महिलाओं को 16000 रुपये देने बाली योजना सर्वाधिक चर्चित है इन्होंने हर जुबान पर शिवराज को चर्चा का विषय बना दिया मुख्यमंत्री शिवराजसिंह की जनआशीर्वाद यात्रा को मिलते प्रदेशव्यापी व्यापक समर्थन से पार्टी और पार्टी के बाहर उनके विरोधियों को बगलें ताकने को मजबूर कर दिया भारी बरसात के बीच कभी कड़ी धूप कहीं आधी रात को जनता शिवराज को सुनने पहुंच रही हैं अब सवाल यह कि मध्यप्रदेश के इस मोदी को कौन टक्कर देगा ?
बात करते हैं कांग्रेस की सियासत की तो हम पहले भी कहते रहे कि दिग्गी और राहुल गांधी के बीच सब कुछ ठीक नही है जो अब सार्वजनिक रूप से सामने आ गया है जब राहुल ने दिग्गी और कमलनाथ को कांग्रेस की नेशनल कमेटी से बाहर का रास्ता दिखा दिया अब बारी दिग्गी की है अपनी कूटनीतिक चालों के लिए जाने जाने बाले राजा साहब के शह मात के खेल में कहीं पर कहीं पर निशाना को चरितार्थ करते हुए शिवराज को टारगेट कर राजधानी में प्रदर्शन कर राहुल गांधी को संदेश देने बाले है साथ ही इस आंदोलन के माध्यम से प्रदेश की सियासत से लम्बे अर्से से दूर रहे दिग्गी फिर कांग्रेस के पोस्टर बॉय बनकर सिंधिया की राह में रोड़ा बनेंगे और कमलनाथ की मजबूरी होगी कि वह दिग्गविजय सिंह के पीछे खड़े हो इसके अलावा उनके पास कोई चारा भी नही है विभिन्न यात्रा के माध्यम से अपनी अपनी सियासी महत्वकांक्षाओं को परवान चढ़ाने की कोशिश में लगे कांग्रेसियों में दिग्गी की कूटनीति सब पर भारी पड़ रही है और अगर चुनावी मुकाबला दिग्गी व शिवराज में हुआ तो दिग्गविजय सिंह के कार्यकाल से शिवराज के तुलना होगी जिसमें दिग्गी शिवराज के सामने खड़े होने की स्तिथि में नही दिखेंगे दिग्गी के कुशासन के विरोध में ही जनता ने पहली बार 2003 उमा के नेतृत्व में भाजपा को पूर्ण बहुमत दिया था जिसे शिवराज के नेतृत्व में दो बार दोहराया गया है अब 2018 में सवाल यह कि शिव के सामने कौन ?

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